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मानसिक, सामाजिक, आर्थिक स्वराज्य की ओर

Rated 5.00 out of 5 based on 27 customer ratings
(30 customer reviews)

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पुस्तक का परिचय, आमुख व समाधान अध्याय पढ़ने के लिए DESCRIPTION टैब पर जाइए। धन्यवाद।

 

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Description

  • परिचय
  • आमुख
  • अंतिम अध्याय "समाधान"
चर्चा

क्रियाशील सामाजिक-यायावर ने भारत के हजारों गावों की पदयात्रा करते हुए और लगभग दो दशक से भारतीय समाज के आर्थिक, सामाजिक व चेतनशील विकास के लिए हजारों परिवारों के लिए धरातल पर काम करते हुए जानने समझने व प्रयोगों को करने के पश्चात निचोड़ के रूप में यह पुस्तक लिखी है। पुस्तक में लेखक सामाजिक समाधान, विकास व चेतनशीलता के लिए मनुष्य व समाज के प्रयासो की कर्मशीलता व उद्यमशीलता की चर्चा उन जीवंत उदाहरणों के साथ करता है, जिन प्रयासों से समाज के हजारों लाखों परिवारों का जीवन समृद्ध हुआ, नदियों का पुनर्जीवन हुआ, नष्ट हो चुके जीव-चक्र की पुनर्स्थापना तक हुई।

सामाजिक-यायावर की किताब जीवंत उदाहरणों व सहज तर्कशीलता के साथ चर्चा-संवाद शैली में यह बताती है कि क्या, क्यों और कैसे करना है। जीवनी-ऊर्जा, समय-ऊर्जा व संसाधनों का विकास में सार्थक उपयोग करना जीवंत व सहज उदाहरणों के साथ बताती है। सहज व सरल तर्कों से मानव-निर्मित तंत्रों पर प्रश्न खड़ा करते हुए स्वतःस्फूर्त अ-अनुकूलन की ओर बढ़ाती है। गाँव व गवाँर को यथार्थ के धरातल में आदर के साथ प्रतिष्ठित करती है। जीवंत उदाहरणों के साथ आम-आदमी को सामाजिक-समाधान, परिवर्तन व निर्माण के लिए उत्तरदायी व क्षमतावान प्रमाणित करती है। पुस्तक यायावर के धरातलीय कार्यों व अनुप्रयोगों और लगभग पूरे भारत का भ्रमण करते हुए प्राप्त जीवंत अनुभवों व समझ पर आधारित है। जो कि समाज व देश के विकास व समाधान के लिए "क्या" "क्यों" और "कैसे" जैसे प्रश्नों का उत्तर प्राप्त करने में गंभीरता, सहजता व सरलता से मदद करती है।

पुस्तक आर्थिक-समृद्धि, सामाजिक-समृद्धि, पर्यावरण-समृद्धि, चेतनशील-स्वतंत्रता आदि से संबंधित अद्वितीय जमीनी कार्यों व प्रयासों तथा धरातलीय उपलब्धियों की बात जीवंत-प्रमाणिकता के साथ करती है। लेखक जो क्रियाशील सामाजिक-यायावर है, ने जीवन की क्रियाशीलता से यह समझा है कि यदि मनुष्य पशुवत नही है, तो गौरवशीलता व चेतनशीलता के साथ ही जीना चाहता है और मनुष्य ही परिवार, समाज, राष्ट्र व संस्कृति का निर्माता, पोषक व संवर्धक है। 

यह पुस्तक उन लोगों के लिए बहुत कुछ लिए हुए है, जो लोग भारतीय समाज के विकास व समाधान के लिए ईमानदार सोच व प्रतिबद्धता रखते हैं; साथ ही यह विश्वास करते हैं कि देश व समाज का निर्माण मनुष्य ही करता है और समाज निर्माण की अपने हिस्से के उत्तरदायित्व व प्रतिबद्धता को जीवंत रूप में जीकर साकार करना चाहते हैं।

यह पुस्तक मुख्यतः मनुष्य की कर्मशीलता पर आधारित सामाजिक समाधान के प्रति प्रयासों व क्रियाशीलता और अननकूलता पर केंद्रित है।यह पुस्तक दृढ़ता से विश्वास करती है कि परिवार, समाज, देश, परंपराएं, जीवन मूल्य व मानव-निर्मित-ईश्वर आदि किसी पराप्राकृतिक शक्ति अथवा वास्तविक ईश्वर द्वारा नहीं बनाए गए हैं; इसलिए मानव समाज को बने बनाए नहीं प्राप्त हुए हैं, वरन् मनुष्य ने परिवार, समाज व देश आदि का क्रमिक निर्माण किया।

मानव-निर्मित धार्मिक, आर्थिक व राजनैतिक तंत्रो व सत्ताओं के द्वारा/लिए स्थापित मिथकों व अनुकूलन के प्रति पैदा होने के समय से मृत्यु तक पूरे जीवन दिए जाने वाले प्रशिक्षणों व घेरों के कारण आजीवन पता ही नहीं चलता है कि जीवन के मायने क्या हैं, जीवन की सार्थकता क्या है और क्या, कैसे और क्यों करना है। इसीलिए मनुष्य को सहजता, संवेदनशीलता, गौरवशीलता, चेतनशीलता व कर्मशीलता की प्राकृतिक व वास्तविक प्रवृत्ति के विरोध में जीना पड़ता है और मनुष्य को प्रशिक्षण के द्वारा बचपन से मृत्यु तक आजीवन ढोंग, हिंसा, घृणा, असहजता, मानसिक व वैचारिक कुरूपता, कपटता व असंवेदनशीलता आदि में ही जीने के लिए मानव-निर्मित परंपराओं, स्थापित मिथकों व अनुकूलन की यांत्रिकता व कृत्रिमता से अनुकूलित किया जाता है। अपवाद छोड़कर इन्हीं अनुकूलताओं में ही आध्यात्मिक गुरु प्रतिष्ठित किए जाते हैं, जिनके पास लोग जीवन, जीवन की सार्थकता व चेतनशीलता को समझने व समझ कर प्रमाणिकता के साथ जी पाने के लिए जाते हैं और बदले में अपने आपको, अपने संसाधनों को, अपनी जीवनी ऊर्जा को आध्यात्मिक गुरू को समर्पित करते हैं। अपने आपको समर्पित करने के बावजूद लोग भ्रम, स्वार्थ, असंवेदनशीलता, आंतरिक-हिंसा, घृणा व अ-सार्थकता आदि में ही जीते हैं, आजीवन समझ नहीं पाते कि वास्तव में जीवन व जीवन की सार्थकता क्या है।

जीवन की सार्थकता इसलिए समझ इसलिए नहीं आ पाती क्योंकि जीवन की समझ बिना कर्मशीलता, बिना जीवंत-संवेदनशीलता, गौरवशीलता व जीवन की प्रमाणिकता के आ ही नही सकती है। जब तक जीवन की समझ नही आती तब तक मनुष्य का चेतनशील हो पाना असंभव है। जो स्वयं ही कर्मशील नहीं है, जो स्वयं ही अ-अनुकूलित नहीं है, जो स्वयं में ही वास्तव में जीवन व जीवन की सार्थकता को नहीं समझा हुआ है, वह दूसरों को सिर्फ अपना अनुगामी बनाकर नए अनुकूलन की ओर ही ले जा सकता है।

किताब में अध्यायों के विषय में कुछ जानकारी 
-- मानव-निर्मित धर्म व ईश्वर की कल्पनाओं, अवधारणाओं व मान्यताओं पर अध्याय
  • मानव-निर्मित धर्म - (पृष्ठ 230)
  • ईश्वर वह है जो ब्रह्मांड को संपूर्णता, संतुलन व व्यवस्था के साथ अस्तित्व में लाया है - (पृष्ठ 232)
  • धर्म निरंतर सीखने और सीखते हुए परिपक्वता व विकास की ओर परिवर्तन की सतत प्रक्रिया है - (पृष्ठ 235)
  • मानव निर्मित धर्म की स्वर्ग की अवधारणा बनाम मनुष्य की कर्मशीलता - (पृष्ठ 238)
  • सतयुग की अवधारणा बनाम मनुष्य की कर्मशीलता - (पृष्ठ 240)
  • मानव निर्मित धर्म और बाबाओं का बाजार - (पृष्ठ 242)
  • पौराणिक व वैदिक काल की कथाएं बनाम मनुष्य की कर्मशीलता - (पृष्ठ 246)
  • वेद मानव-निर्मित हैं - (पृष्ठ 250)
-- जाति-व्यवस्था पर अध्याय
  • भारतीय जाति-व्यवस्था श्रमशीलता को तिरस्कृत करने वाली सामाजिक दासत्व व्यवस्था है - (पृष्ठ 253)
  • सामाजिक आरक्षण बनाम संवैधानिक आरक्षण - (पृष्ठ 255)
  • जाति-व्यवस्था और राजनीति - (पृष्ठ 260)
  • जाति-व्यवस्था के कारण भारत के लोगों में वैज्ञानिक दृष्टिकोण व स्वतंत्र मौलिक मनोवृत्ति का विकास नहीं हो पाया - (पृष्ठ 262)
  • जाति-व्यवस्था बनाम सोने की चिड़िया वाला सामाजिक-समृद्ध भारत - (पृष्ठ 264)
-- स्त्री की स्थिति व स्वातंत्र्य पर अध्याय
  • भारतीय परिवार और परिवार के मूल्य - (पृष्ठ 268)
  • स्त्री - (पृष्ठ 272)
  • स्त्री के प्रति हमारा नजरिया और शुचिता का आडंबर - (पृष्ठ 275)
-- भारतीय नौकरशाही पर अध्याय
  • नौकरशाह बनाम नेता बनाम भ्रष्टाचार - (पृष्ठ 277)
  • आजादी के पूर्व व आजादी के पश्चात् नौकरशाही एक दिग्दर्शन - (पृष्ठ 278)
  • पंचायती राज और नौकरशाही - भयंकर विरोधाभास - (पृष्ठ 285)
  • समाज सेवा व देश निर्माण बनाम आईएएस युवा बनाम गैर आईएएस युवा - (पृष्ठ 286)
  • भारतीय लोकतंत्र बनाम नौकरशाही-विडंबना - (पृष्ठ 289)

Additional information

Weight 900 g

30 reviews for मानसिक, सामाजिक, आर्थिक स्वराज्य की ओर

  1. Rated 5 out of 5

    Thomas Koovalloor

    Thank you for sharing your life journey.
    Thomas koovalloor

  2. Rated 5 out of 5

    Pannalal Nawalkha

    India of today is country of your dreams. A commoner got mandate to rule by commoners.
    Common day to day problems are attended on priority.. TODAY. COMMON MEN iIS A KING.

    Dr.P . L.Nawalkha

  3. Rated 5 out of 5

    Ummed Singh Baid

    thanks. its great.

  4. Rated 5 out of 5

    D Raja Ganesan

    Wish u all success
    D.Raja Ganesan

  5. Rated 5 out of 5

    Veer Vikram

    Dear sir,
    It is very heartening to see preface of ur Book. Very congratulations for your good work.
    With best regards
    Veer Vikram

  6. Rated 5 out of 5

    Mohan Dadlani

    I agree with your views.
    However the commoners in society have no plans for moving society in a desired direction.
    The leadership has vision, motivational skills and management skills to mobilize resources in optimum way to ensure that desired goals are achieved.
    In case the circumstances change, management can review and revise goals. Commoners may not be able to adjust course in a timely manner.

    Happy new year
    Mohan, USA

  7. Rated 5 out of 5

    Vijay Kumar Agarwal, IAS

    Heartiest congratulations. Keep it up. Bye.

  8. Rated 5 out of 5

    Prof. Gopi Chand Narang

    Very good, congrats.
    GCN

    Prof. Gopi Chand Narang
    Former President, Sahitya Akademi
    (National Academy of Letters, India)
    Professor Emeritus, Jamia Millia Islamia
    Professor Emeritus, Delhi University

  9. Rated 5 out of 5

    Adharshila Learning Centre

    First thought on first glance – commoner as individual or part of community, larger society or all? and therefore the relation btwn the different identoties and roles

    Amit

  10. Rated 5 out of 5

    Sanjay Rai

    प्रिय विवेक जी
    नमस्कार
    आप का मेल मिला आप की पुस्तक के सम्बन्ध में आप आप ने जो विषय चुना है सही मायने में यह आज के सामजिक सरोकारों के लिए सही होगा …..आप अनुभवी व्यक्ति है पूरा देश आपने अपनी नजरों से देखा है …..आप जो लिख रहे हैं उसका लाभ कुछ लोगों को ही ना मिले यह भी प्रयास कीजियेगा …पुस्तक का हिंदी रूपान्तर आये तो आम जन को भी इसका फायदा होगा यह मेरा सुझाव है आप को अग्रिम शुभकामना
    संजय राय

    Ishan Times
    Daily & Weekly News paper
    ( CHANDIGARH & DELHI )

  11. Rated 5 out of 5

    Jani Reddy

    Thank you sir, for attempt in this direction.

    Rgds,
    janireddy.
    hyderabad.

  12. Rated 5 out of 5

    Anupam Paul

    Thanks Vivek for you upcoming book.

    Anupam Paul
    Kolkata

    Dr Anupam Paul
    Assistant Director of Agriculture
    Agricultural Training Centre
    Govt Of West Bengal
    Directorate of Agriculture

  13. Rated 5 out of 5

    Prof Hafiz Yahya

    Many Congratulations

  14. Rated 5 out of 5

    Venkataramanaiah Chekuru

    Thank you for the information.
    A very useful initiative to society.
    regards
    C.Venkataramanaiah

  15. Rated 5 out of 5

    Kate Daum

    Congratulations! Best wishes, Kate

  16. Rated 5 out of 5

    Mahek Shah

    Hi Vivek ji,

    Best of luck for your book.

    Request you to take pics of broken-down places or services in villages during your future tours – via SwachhBharatApp.com (android app). I am sending monthly curated reports to PM office. This may indirectly help in fixing things up for them.

    Regards,
    @mahekmshah

  17. Rated 5 out of 5

    Harish Kumar

    THANKS DEAR SIR
    MY APPRECIATION

    HARISH
    FIROZABAD

  18. Rated 5 out of 5

    Rajiv kumar Suman

    Heartiest congratulations for this laborious work. Hope this book really help for those who are Gandhian researcher and value the nature…I have read a book written by J.C.Kumarappa some year ago. I was very much influenced by this book. I think this book will also influence the people.

  19. Amla Ashok Ruia, Mumbai Maharashtra

    Thank you very much Vivek. It is very kind of you to give credence to my work. I have had a cursory glance at your book last night. I will read all of it and get back to you. Thanks
    Amla

  20. Arun Kumar Sinha, IAS – Principal Secretary, Labour, Uttar Pradesh

    Got your book. A glance shows your varied experience with all types of people. Many people are working for society selflessly. Felt happy and proud by your book.

    Arun

  21. Rated 5 out of 5

    Economic Rural Development Society

    Dear Vivek,

    We have returned to Kolkata safely. We are really very satisfied to discuss with you regarding all our social activities.

    We have handed over your thoughtful book to one of our friends of Bihar, who appreciated your practical field idea.He may contact with you if necessary. He is also running an NGO in Bihar.

    We cordially invite you and your wife at our project sites as per your convenient date and time. As you desired, we will send the name of the rural disadvantaged students for scholarship program. We like to keep in touch with you.

    Warm regards,

    Madhu and Provat.

    Yours sincerely
    Madhu Basu
    Founding General Secretary
    Economic Rural Development Society

  22. Rated 5 out of 5

    Ritu Jamal

    Haven’t gone through a more honest and comprehensive book on the subject of social commitment in Indian concept. Deepest congratulations to the author and all the best for further endeavors.

  23. Rated 5 out of 5

    Nishant Rana (verified owner)

    आज के समय में ऐसी मौलिक पुस्तकों का मिलना जो चेतना को जाग्रत करते चली जाती हो कोयले की खान में हीरे के मिलना जैसा अनुभव है.
    किताब इतने सुंदर और व्यापक ढंग से लिखी हुई है की मन मस्तिष्क में उठते रहते सभी प्रश्नों के जवाब बड़े ही सहज रूप में सामने रखती है. किताब हमारे सामाज का मनोवैज्ञानिक रूप न केवल विश्लेष्ण प्रस्तुत करती है बल्कि आधुनिक सामाज की परेशानियों का समाधान एवं समाधान के लिए किए जा रहे यायावर के जमीनी प्रयासों को भी बड़ी बेबाकी से प्रस्तुत करते हुए आगे बढती है.
    सामाजिक यायावर की यह किताब आने वाले समय में हिंदी साहित्य की क्लासिकल किताबों में न शामिल हो इसमें कोई शक नहीं .

  24. Rated 5 out of 5

    संजीव

    सारगर्भित, सुरुचिपूर्ण और सामाजिक दृष्टि से महत्वपूर्ण पुस्तक। समाज, व्यक्ति, मन और प्रकृति के आपसी संबंधों को समझने तथा मीडियाबाजी से दूर रह कर यथार्थ सामाजिक कार्यों में लगे लोगों के बारे में जानने के लिए एक आवश्यक पुस्तक।

  25. Rated 5 out of 5

    Sanjiv

    Undoubtedly sui generis, this book provides a deep and lucid understanding of intricate structure of human psyche, society, religion and nature. Moreover, it is an essential book if one is curious to know what actually social activism is, sans false propaganda, pretentious approach and show off.

  26. Rated 5 out of 5

    Suraj

    मुझे यह पुस्तक पढ़ने का अवसर अमरोहा लाइब्रेरी में मिला। इसमें मानसिक सामाजिक अर्थिक स्वराज का वर्णन बहुत सूक्ष्म और सरल तरीके से किया गया है। किताब प्रकृति की ओर बढ़ने की प्रेरणा देती है जो आज के जीवन में बहुत ही मत्वपूर्ण है।

  27. Rated 5 out of 5

    Binkush

    यह किताब हमारे समाज का बहुत ही अच्छा वर्णन करती है।
    प्रत्येक व्यक्ति को यह किताब एक बार अवश्य पढ़नी चाहिए।

  28. Rated 5 out of 5

    Sachin Raj Singh

    कम से कम उस व्यक्ति को यह पुस्तक जरूर पढ़नी चाहिए, जो समाज की बेहतरी के लिए सोचता हो, समाज में सम्भावनाये और उनको प्राप्त करने के बारे में सोचता हो| यह पुस्तक समस्या ही नहीं बल्कि समाधान की भी बात करती है| धरातल पर जाकर अनुप्रयोग करते हुए सामाजिक यायावर ने इस पुस्तक को एक जीवंत रूप दिया हैं| यह पहली पुस्तक होगी जिसमे लेखक स्वयं को २० से २५ बर्ष तक भारत के रिमोट एरिया में जाकर समस्या को समझता है, समाधान की खोज करता और खुद की ऊर्जा, समय खपाते हुए एक रचनात्मक हल निकलता है और वहाँ के समाज को एक सकारात्मक दृष्टि देता है , फिर जाकर इस पुस्तक को लिखता है|
    अंततः मैं यही कहना चाहूंगा, यह पुस्तक आप जितनी बार पढ़ते है, उतनी बार आप को एक नई चेतना मिलती है| सारी समस्याओं का हल इस एक पुस्तक में समाहित है|

  29. Rated 5 out of 5

    Omveer singh

    i have read this book many times…i really appreciate writer’s efforts for expressing different view to readers…heartily congratulations to author and best wishes for future

  30. Vijendra Diwach

    सर जी आपकी किताब पढी है। बहुत कुछ सिखाती है। आपके द्वारा स्वयं पर किये प्रयोग और आपकी सोच को सलाम। आपके जितनी परिस्थितियोँ मेँ इंसान टूट जाता है लेकिन आपने ऐसी परिस्थितियोँ मेँ भी अपने बारे मेँ न सोचकर समाज के बारेँ मेँ सोचा हैँ। आपकी जीवन को सम्पूर्णता से जीने का संघर्ष बहुत सीखा रहा है। ग्लैमर से दूर अपनी ही धुन मेँ बिना नाम,शोहरत की परवाह समाज के उत्थान मेँ लगे रहना आपकी सम्पूर्णता है। लोग 1 रुपये का दान कर देँ तो उसे अखबारोँ की खबरे बना देना चाहते हैँ और बना भी देते है।

    किताब मेँ बहुत गहराई है,मै शुक्रगुजार हूँ फेसबुक का जिसने आप से सम्पर्क करवाया। आप मुझे हमेशा कहते हो आपकी जय हो। आज मैँ आपकी जय की कामना करता हूँ। आपसे जीवन जीना सिखते रहे।

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